Saturday, 22 June 2013

gjhjk

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  1. यह कैसा लोकतंत्र है?
    मूल रुप से नालंदा जिले के रहने वाले यमुना बाबू को पटना हाईकोर्ट के परिसर में देखा जा सकता है। इनकी दोनों आंखें नहीं हैं, फ़िर भी ये प्रायः रोज ही हाईकोर्ट परिसर में एक कोने में बैठे रहते हैं। दो दिनों पहले बिहार के जाने माने आरटीआई कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय ने मुझे इनसे मिलवाया। पहले दिन यमुना बाबू ने मुझे बताया कि पटना के एक बड़े और प्रभाव वाले एक डाक्टर सत्यजित सिन्हा के कारण इन्हें अपनी इकलौती आंख से भी हाथ धोना पड़ा। बाद में उन्होंने इस मामले को लेकर जिला उपभोक्ता फ़ोरम में केस किया। फ़ोरम ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और फ़ैसला यह दिया गया कि डाक्टर की गलती के कारण यमुना बाबू की इकलौती आंख की रौशनी खत्म हो गयी, इसलिए वे मुआवजे के हकदार हैं। अपने फ़ैसले में जिला उपभोक्ता फ़ोरम ने यमुना बाबू को 6 लाख रुपए मुआवजा दिये जाने का निर्देश दिया।
    यमुना बाबू ने बताया कि उनकी एक आंख बचपन में खेलते समय फ़ूट गयी थी और वे एक ही आंख के सहारे जिंदगी जीने लगे। वर्ष 2005 में जब उन्हें अपनी इकलौती आंख से भी दिक्कत होने लगी तब उन्होंने लाला लाजपत राय हाल में आयोजित एक नेत्र चिकित्सा शिविर में डा सत्यजित सिन्हा से दिखलाया। पहले दिन डा सिन्हा ने कुछ दवायें लिखीं और फ़िर मिलने को कहा। जब कोई फ़ायदा नहीं हुआ तब यमुना प्रसाद फ़िर दुबारा पहूंचे। इस बार डा सिन्हा ने अपनी निजी क्लीनिक में आने को निर्देशित किया।
    औकात नहीं होते हुए भी केवल इसलिए कि अगर इकलौती आंख भी ठीक हो जाये तो ज़िंदगी फ़िर से अपनी राह पर चले। यही सोचकर यमुना बाबू ने डा सिन्हा द्वारा 2500 रुपए मशीन से जांच के नाम पर वसूला गया। फ़िर उन्हें ओटी में भी ले जाया गया और आपरेशन के क्रम में ही उनकी इकलौती आंख चली गयी। बेचारे यमुना बाबू ने खूब गुहार लगाया। लेकिन डाक्टर ने एक न सुनी। उन्हें यह कहकर टरकाता रहा कि वह बहुत जल्द ही उनकी आंख को ठीक कर देगा। बाद में एक मित्र की सलाह पर यमुना बाबू ने आईजीआईएमएस जाकर अपनी आंख का जांच कराया और जांच के क्रम में पुष्टि हुई कि डाक्टर की लापरवाही के कारण उनकी आंख की रोशनी चली गयी। इस मामले को लेकर तब यमुना बाबू जिला उपभोक्ता फ़ोरम में गये।
    देश में लोकतंत्र ही है कि मार्च 2005 में आंख फ़ूटने के मामले की सुनवाई जिला उपभोक्ता फ़ोरम में 2009 में पूरी हुई। फ़ैसला यमुना बाबू के पक्ष में था। उन्हें छह लाख रुपए का मुआवजा दिये जाने का आदेश दिया गया था। बेचारे यमुना बाबू को थोड़ी आस बंधी कि वे इस पैसे से अपनी आंख का बेहतर इलाज करवायेंगे। अगर नहीं हो सका तो इसी पैसे को बैंक में रखकर सूद से जीवन की गाड़ी चलायेंगे। लेकिन आरोपी डाक्टर ने एक और गेम किया। उसका दिया हुआ चेक बाउंस कर गया और तब इस मामले की शिकायत यमुना बाबू ने थाने में कर दी। मामला एक बार फ़िर अदालत पहूंचा। अदालत ने इस मामले में जिला उपभोक्ता फ़ोरम के आदेश को स्थगित करने का आदेश दिया। डाक्टर ने इस आधार पर राज्य उपभोक्ता फ़ोरम में अपील किया। यमुना बाबू का कहना है कि राज्य उपभोक्ता फ़ोरम में डाक्टर के करीबी रिश्तेदार थे। उन्होंने पक्षपातपूर्ण तरीके से फ़ैसला सुनाया। फ़ैसला सुनाने वाले ने डाक्टर की इस दलील को स्वीकार किया कि जब वह यमुना बाबू की आंख का आपरेशन करने के लिए सूई देकर सुन्न करने का प्रयास किया उसी दौरान यमुना बाबू ने अपना सिर हिला दिया और इस कारण उनकी आंख खराब हो गयी।
    बहरहाल, यमुना बाबू लाचार हैं। अपने बाल-बच्चों तक ने इनका साथ छोड़ दिया है। लेकिन शिव प्रकाश राय ने इनकी सहायता करने का निर्णय लिया है। उन्होंने बताया कि वे इस मामले को केंद्रीय उपभोक्ता न्यायालय में ले जायेंगे और यमुना बाबू को इंसाफ़ दिलाने का प्रयास करेंगे। वैसे नालंदा के यमुना बाबू को इस बात का अफ़सोस भी है कि नालंदा का होने के बावजूद केवल जाति विशेष का नहीं होने के कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनकी कोई मदद नहीं की। वे अपना दुखड़ा लेकर नीतीश कुमार के दरबार में गये थे। जहां उनके आवेदन पर बिहार के डीजीपी ने कहा था कि आपके मामले में केवल न्यायालय ही मदद कर सकती है। यमुना बाबू कहते हैं कि सीएम चाहते तो उन्हें कब का इंसाफ़ मिल गया होता।

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  2. नक्सलवाद की असली जड़ है ब्राह्म्णवाद
    दोस्तों, यह बात भले ही वामपंथी मित्रों के गले न उतरे कि उनका असल विरोध ब्राह्म्णवाद से है। वे इसे वर्ग संघर्ष करार देते हैं और जमीनी सच्चाईयों से मुंह छिपाते हैं। आश्चर्य होता है जब इतनी छोटी सी बात वे समझकर भी समझना नहीं चाहते हैं। संभव है कि वे इस बात को समझते हों, लेकिन इस बात को स्वीकार करने से हिचकते हों। दरअसल यह बात समझने की है कि आखिर वे कौन से कारक है जो भूमिवान सवर्णों को नक्सली आंदोलन का श्रेय लेने के लिए प्रेरित करता है।
    बिहार का बेगूसराय जिला जिसे वामपंथ का जिला भी कहा जा सकता है। बिहार में वामपंथ सबसे अधिक पुख्ता तरीके से इसी जिले की धरती पर मजबूत हुआ। यहां के अनेक सवर्ण जमींदारों ने जमींदारी छोड़कर गरीबों-मजलूमों का नेतृत्व किया। अपने नेतृत्व में एक से बढकर एक लड़ाइयां लड़ीं। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो भूमि सुधार के सवाल पर इन वामपंथी जमींदारों ने कभी भी अपने लिए भूमि सुधार की बात नहीं की। अनेक वामपंथी नेता हुए हैं जिन्होंने एक ओर गरीबों की लड़ाईयां लड़ीं और उनके बेटों ने विदेशों में जाकर पढाई की। आज वे बिहार में बड़े-बड़े पदों पर आसीन हैं। कई तो सरकार की नाक का बाल तक बने हुए हैं।
    सवाल यह है कि नक्सलवादियों में व्याप्त ब्राह्म्णवाद को कौन चुनौती देगा। आज किसी भी वामपंथी संगठन का उदाहरण लें फ़िर चाहे वे सशस्त्र आंदोलन में लगे हों या फ़िर लोकतांत्रिक तरीके संघर्ष को अंजाम दे रहे हों, उनका नेतृत्व केवल सवर्णों के हाथ में ही है। आश्चर्य होता है कि गरीब दलितों और पिछड़ों के बल पर राजनीति करने वाले वामपंथी दल किसी दलित और पिछड़े को अपना नेता क्यों नहीं मानते। उदाहरण के लिए बिहार के तीन बड़े वामपंथी दलों को ही देख लें। भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल जाति के सवर्ण हैं। भाकपा के राज्य सचिव राजेंद्र प्रसाद सिंह और सीपीएम के राज्य सचिव विजय कांत ठाकुर की जाति भी सवर्ण ही है। भाकपा के इतिहास मे केवल एक बार ओबीसी वर्ग के सूरज बाबू को राज्य सचिव की जिम्मेवारी दी गयी थी और इसके लिए आज भी भाकपा के नेताओं के मुंह से सदवचन नहीं निकलते हैं। इन नेताओं को कहना है कि सूरज बाबू के कारण ही बिहार में भाकपा कमजोर हुई।
    खैर, यह तो बात हुई वामवाद के बहाने ब्राह्म्णवाद के बढते वर्चस्व की। अब बात मूल मुद्दे की। नक्सलवाद का प्रारंभ ही सामाजिक विषमता और इसके कारण उपजी परिस्थितियों से संघर्ष करने को लेकर हुई थी। हालांकि नक्सलवाद का उदय कोई पहली घटना नहीं थी। इससे पहले भी सशस्त्र संघर्ष के अनेक उदाहरण अतीत के पन्नों में देखे जा सकते हैं। ब्राह्म्णवाद के मूल में ही सामाजिक विषमता है। इसके अनुसार आदमी की हैसियत उसके जन्म लेने पर ही निर्धारित हो जाती है। जबतक वह गर्भ में रहता है संज्ञाविहीन रहता है। जन्म लेने के साथ ही वह इंसान न होकर ब्राह्म्ण, क्षत्रिय, शुद्र या फ़िर वैश्य बन जाता है। इसी के आधार पर समाज और प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों पर उसकी हिस्सेदारी तय कर दी जाती है।
    सवाल यह है कि जबतक ब्राह्म्णवाद रहेगा तबतक क्या समाज और समाज में रहने वाले इंसानों को इन विषमताओं से मुक्ति मिल सकती है। भूमि सुधार का सवाल केवल जमीन बंटवारे तक सीमित नहीं है। नीतीश सरकार ने जब भूमि सुधार आयोग बनाया और फ़िर उसकी अनुशंसाओं पर सवाल उठाने वाले कौन लोग थे। वामपंथी मित्रगण यह तर्क दे सकते हैं कि भारत में हिन्दू धर्म है और इसके कारण ब्राह्म्णवाद है लेकिन अन्य धर्म भी तो हैं, फ़िर उन धर्मों में विषमतायें क्यों हैं। वे यह भी तर्क दे सकते हैं कि जिन देशों में हिन्दू धर्म नहीं है वहां विषमतायें क्यों हैं।
    लेकिन इस सवालों का जवाब तो ब्राह्म्णवाद के पास ही है। इसकी वजह यह है कि ब्राह्म्णवाद महज के संज्ञा है जिसका इस्तेमाल मैं समाज में अपना वर्चस्व स्थापित रखने की प्रवृति के लिए कर रहा हूं। भारत में इसका प्रभाव अन्य धर्मों पर भी है। अलबत्ता जिन धर्मों में इसका प्रभाव कम है, वहां सामाजिक विषमता कुछ कम अवश्य है। अन्य देशों में जो विषमतायें मौजूद हैं, उसकी मूल वजह भी ब्राह्म्णवाद ही है। अंतर केवल इतना है कि अन्य देशों में इसका चेहरा गोरा हो जाता है।

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